क्या भारत की राजनीति में होने वाला हैं बड़ा परिवर्तन? क्या हैं बीजेपी के हिन्दू व मुस्लिम की राजनीति का जवाब? क्या विपक्ष दिखेगी नयी रणनीति के साथ? क्या एक बार फिर बीजेपी सरकार? इस लोकसभा में कौन होगा प्रधानमंत्री? कौन होगा कांग्रेस का चाणक्य? क्या एनडीए एक बार फिर पहुंचेगी बहुमत के करीब? क्या युवाओं के मुद्दें केवल नीट परीक्षा तक सीमित? फिलहाल के लिए तो इन सवालों के इर्द-गिर्द नाचती भारतीय राजनीति की तस्वीर। इन सभी सवालों के जवाब शायद हर भारतीय के लिए दूर की कड़ी ही नज़र आते दिखायी देने लगे हैं और शायद इन्हीं मुद्दों के साथ शुरू होती भारतीय राजनीति की बहस किसी भी अंजाम तक नहीं दिखायी देती। विपक्ष की एकता एक बार फिर नये सवालों को जन्म देती तो वही सत्तापक्ष एक बार फिर सत्ता की ओर देखती नज़र आती हैं। वजह चाहें जो भी हो एक तरफा अपनी जीत का दावा करने वाली ममता को भी अपने ही गढ़ में भयंकर हार का सामना करने के साथ अब पार्टी के वजूद पर भी कहीं न कहीं सवालिया निशान ही दिखयी देते हैं। वहीं समाजवादी पार्टी के लिए एक बार फिर उत्तर प्रदेश एक कठोर चुनौती सी मालूम होती हैं।
वैसें तो भारतीय राजनीति में कई अहम मुद्दों के साथ बीजेपी के हिन्दू व मुस्लिम की राजनीति कहीं न कहीं दूसरे राजनीतिक पार्टियों पर हावी होती ही दिखायी दे रहीं हैं। सीजेपी जैसी दूरदर्शी पार्टी ने युवाओं को जोड़नें के साथ कहीं न कहीं केवल पेपर लीक का मुद्दा उठाकर सवाल को बांधने का काम किया हैं। सवाल यह हैं क्या युवाओं के मुद्दें केवल पेपर लीक तक सीमित हैं? वैसे सवाल कई मायनो में यह भी अहम हैं कि इतनी आसानी से सीजेपी व सोनम वांगचुक को धरना प्रदर्शन करने की इजाज़त कैसे?
क्या फिर हावी बीजेपी के मुद्दें?: बंगाल में ममता की करारी हार के बाद एक बार फिर विपक्ष की बनायी रणनीति सवालों के घेरे में ही दिखायी देती हैं। सत्तापक्ष के हिन्दुत्व के एजेंडे कहीं न कहीं हावी होते तो वहीं विपक्ष को कमज़ोर करते ही दिखायी देते हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश का चुनाव भाजपा के लिए आसान तो वहीं विपक्ष के लिए एक बार फिर नये सवाल ही खड़े करता दिखायी देता हैं, जिनका कोई जवाब तो फिलहाल के लिए नज़र नहीं आता। चलिए आगे बढ़ते हैं।
विपक्ष को किन मुद्दों की ज़रूरत: वैसे तो कांग्रेस ने एक बार फिर 2029 के चुनाव को लेकर ज़ोर पकड़ लिया हैं, यह तो नहीं कहा जा सकता एक बार फिर कांग्रेस 2014 या 2019 वाली ही भूमिका में नज़र आने वाली हैं। लेकिन एक बार फिर विपक्ष अपने को एकता के सूत्र में पिरोता तो सत्तापक्ष को जवाब देने के उद्देश्य से नये विचारों की तलाश में भटकता नज़र आता हैं। हिन्दू-मुस्लिम मुद्दें को अपना गोल्डन रूल मानते हुए सत्तापक्ष अपनी सीट को तोड़फोड़ के माध्यम से बढ़ाता ही नज़र आता हैं। ऐसे में सवाल यह भी कि अगर जीत आपके करीब हैं, तो सांसद की तोड़ फोड़ बीजेपी को क्यों आ पड़ी? इसका जवाब हो सकता हैं, वह बिल जो हालही में संसद में गिर गया जिसका बड़ा लाभ उठाया जा सकता हैं या नायडू व नितीश से किसी भी प्रकार का खटपट का जवाब ढ़ूढा जा रहा है। वजह चाहें जो भी हो विपक्ष के लिए जवाब एक गंभीर चुनौती सी मालूम होती हैं।
सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं को जोड़ने वाली नयी नवेली सीजेपी मुद्दों को सीमित करने के साथ सत्तापक्ष की जवाबदेही को भी सीमित मात्रा में पिरोने की कोताही करती नज़र आती है। कहीं यह भी सत्तापक्ष की रणनीति के साथ तो आगे नहीं बढ़ रही? सवाल यह हैं कि क्या युवाओं के मुद्दें केवल नीट परीक्षा या शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक सीमित कर देना ठीक हैं? सवाल यह हैं कि क्या केवल शिक्षा व बेरोज़गारी के मुद्दें पर विपक्ष चुनावी मैदान में नज़र आने वाला हैं? वैसे बता दें कर्नाटक के नये नवेले गृह मंत्री अपने कार्य को लेकर चर्चा में नज़र आ चुके हैं। वहीं तमिलनाडु में नये नवेले मुख्यमंत्री विजय भी अपने नये-नये निर्णय को लेकर विपक्ष की आंखों का तारा सा दिखायी देते हैं। वजह चाहें जो भी हो एक बार फिर विपक्ष को नये सिरे से विचार करने के साथ नये मुद्दें पर हुंकार भरने की जरूरत सी दिखायी देती हैं। सवाल एक बार फिर वही हैं, क्या बेरोज़गारी के मुद्दें पर विपक्ष सत्ता के करीब पहुंचने वाली हैं? या किसी नये मुद्दे को अपना हथियार बनाया जायेगा।
कौन हो सकता हैं कांग्रेस का चाणक्य: चलिए पहले कुछ पुरानी बातो पर चर्चा कर ही लेते हैं। बात हैं साल 2017 की गुजरात राज्यसभा चुनाव के दौरान खतरे में पड़ी अहमद पटेल की सीट पर बीजेपी के चाणक्य यानी अमित शाह से सामना करने वाले काग्रेस के एक मज़बूत नेता की बात की जा रही, जी हां 2018 में कांग्रेस की कर्नाटक में सरकार बनाने में भूमिका निभाने वाले एक सिद्धांतवादी नेता की बात की जा रहीं, जी हां यह वहीं नेता हैं जिसको 2019 में आईटी व ईडी के शिकंजे पर तिहाड़ जेल में भी बिताने पड़े, यह वहीं नेता हैं जो 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में एक मज़बूत रणनीति के साथ उतरे और उप मुख्यमंत्री के पद पर विराजमान हुए, जी हां मैं बात कर रहा हूं कर्नाटक के नये नवेले मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार एक निडर व मज़बूत नेता के रूप में उभरने वाले डीके शिवकुमार अब कांग्रेस के चाणक्य या यूं कहें संकटमोचक के रूप में देखे जाने लगें हैं। कयास यह भी लगाये जा चुके हैं कि इसी 2028 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव की पूरी जिम्मेदारी कांग्रेस ने उनके कन्धे पर डाल रखी हैं और इस विधानसभा चुनाव के बाद वह 2029 के लोकसभा में भी कांग्रेस के चाणक्य की भूमिका में नज़र आने वाले हैं। कयास यह भी लगाये जा रहें हैं यह वही डीके शिवकुमार हैं, जिसके प्रभाव में 2026 के कर्नाटक के विधान परिषद चुनाव में बीजेपी विधायक की क्रास वोटिंग हुई। वैसे कर्नाटक में कई अहम मुद्दों पर रणनीति बनाने में सुनील कानूगोलू का नाम भी चर्चा में रहा हैं। हो सकता हैं आपने यह नाम पहले कभी न सुना हो पर आपको बता दें कांग्रेस के अहम रणनीतिकारों में से एक माने जाने वाले सुनील कानूगोलू ने राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा की रूपरेखा तैयार करने में अहम भूमिका निभायी थी। जानकारी के अनुसार इस बार लोकसभा चुनाव में वह अहम भूमिका में नज़र आने वाले हैं। इसके अलावा कांग्रेस अहम रणनीतिकारों में बीवी श्रीनिवास व राजेंद्र पाल गौतम का नाम भी चर्चा में हैं। जिनको अहम जिम्मेदारी दी जाने वाली हैं। हो सकता हैं हमारी सारी बाते गलत हो पर चर्चा जारी रहेगी।
क्या हैं उत्तर प्रदेश में विपक्ष की भूमिका: वैसे उ0प्र0 में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी समाजवादी पार्टी की चर्चा कर लेना चाहिए। 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहीं सपा भी अपनी पूर्ण बहुमत का दावा कर चुकी हैं। यहां पर कांग्रेस भी पूरी तरह से समाजवादी पार्टी पर ही अपना दाव लगाने पर लगी हुई हैं। अब देखने वाली बात यह होने वाली हैं कि उत्तर प्रदेश के मुखिया यानी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ किस रणनीति के साथ उतरने वाले हैं। वैसे तो इतिहास गवाह हैं उत्तर भारत की राजनीति में कहीं न कहीं एक बार फिर हिन्दू व मुस्लिम के राजनीतिक मुद्दे हावी रहने वाले ही हैं पर देखने वाली बात यह होगी कि सरकार बनाने का दावा करने वाली विपक्ष का जवाब कितना असरदार होने वाला हैं।



