भारतीय संविधान का आर्टिकल- 21 जितना एक भारतीय पर लागू होता हैं, उतना ही उन भारतीय मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होता हैं, जो रोज़ाना खुद को सवालों के कटघरे में घिरा पाती हैं।
पढ़ाई लिखायी तो होती रहेगी अब इसके हाथ पीले कर दों…लड़की की पढ़ायी में क्या ही रखा हैं… शादी के बाद तो चूलहा चौका ही सम्भालना हैं…आठ तक पढ़ लिया बहुत हैं…अब घर का काम देखें…हमारी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं हैं…अब हमसे नहीं होता…इनके पिता की इतनी कमायी नहीं हैं कि लड़की को बारहवी तक भी पढ़ा पायें…अब अपना ससुराल संभालें…बाहर का माहौल बहुत खराब हैं, लड़कियों को बाहर नहीं निकलना चाहिए। लड़कियों के लिए इन वाक्यों के साथ शुरू होती मुस्लिम परिवार में बहस नये सवालों को कटघरे में खड़ा पाती हैं। क्या किसी ने यह पूछा वह कितना पढ़ायी करना चाहती हैं। वैसे तो भारतीय संविधान का आर्टिकल- 21 जितना एक भारतीय पर लागू होता हैं, उतना ही उन भारतीय मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होता हैं, जो रोज़ाना ऊपर दिये सवालों के दौर से गुज़रती हैं। हालही में मिली एक हमारी दोस्त कहती आप लिखतें हैं, बहुत अच्छी बात हैं, अगर आप मुस्लिम लड़कियों के मुद्दों को छोड़ देते हैं, तो यह उनके साथ न इंसाफी करते हैं। इसी के साथ विचार अब नयें मुद्दों पर और शुरूआत संविधान के साथ।
क्या हैं संविधान में: आर्टिकल 21ए कहता हैं 6-14 वर्ष की आयु के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा मिलनी चाहिए। चलिए आसान भाषा में बढ़ते हैं, संविधान हर बच्चें की बेसिक शिक्षा को अनिवार्य बनाने की बात करता हैं। आज़ादी के 75 वर्ष बाद अगर हम बेसिक शिक्षा की ही बात पर चर्चां करने वाले हैं तो यह हमारी न कामयाबी ही नज़र आती हैं और इस न कामयाबी में राजनीतिक व सामाजिक कारण को नज़र अंदाज़ करना भी उस समाज के साथ ही न इंसाफी ही नज़र आती हैं जिसके साथ के बिना किसी भी मुकाम को हासिल करना फिलहाल के लिए तो आसान नज़र नहीं आता। फिलहाल चर्चा हम उन्हीं मुस्लिम लड़कियों की तरफ ले जाने वाले हैं, जिनकी शिक्षा पर सवालिया निशान आज भी नज़र आते है।
क्या शिक्षा प्राप्ती में रूकावट: चलिए अब मुस्लिम लॉ की ओर बढ़ते हैं यहां पर वयस्कता यानी बालिक होने की आयु 15 साल मानी जाती हैं और 15 वर्ष के कम आयु के लड़के व लड़कियों के अभिभावक ऐसे व्यस्क यानी बालिक से विवाह करने की संविदा यानी कांट्रेक्ट कर सकता हैं। बस इसमें कंडीशंस यह हैं कि आयु 7 वर्ष से कम की नहीं होनी चाहिए। पर इसमें यह कहीं नहीं दिया हैं कि सारी शिक्षा को छोड़ केवल शादी को प्राथमिकता दिया जाय। शादी की कम उम्र में बाध्यता कहीं न कहीं शिक्षा को कमज़ोर करती ही नज़र आती हैं। लेकिन शिक्षा न प्राप्त करने की वज़ह केवल इसे ही माना जाना चाहिए, क्या यह सहीं हैं? पर बहुत सी वज़ह में से एक इसे माने जाने पर किसी को गुरहेज़ नहीं होना चाहिए। फिलहाल के लिए ये जान लेना भी आवश्यक हैं कि बाल विवाह अवरोध अधिनियम 1929 ने कहीं न कहीं कम उम्र में शादी पर लगाम लगाया हैं। लेकिन यहां हमारा आश्य किसी भी पसर्नल लॉ की कमियों को बताना तो नहीं या पर्सनल लॉ यह कहीं पर भी नहीं कहता कि शिक्षा से पहले शादी को ही प्राथमिकता मिलनी चाहिए। हां यह कहा जा सकता हैं कि आयु एक छोटा सा ही सही पर एक अहम कारण हो सकता हैं, शिक्षा प्राप्ति की रूकावट में। वैसें तो मुस्लिम समाज में परिवार की कम आय या निर्धनता हर समस्या की जड़ सी दिखायी देती हैं।
क्यों शिक्षा पर जोर: शिक्षा का मतलब यह नहीं कि केवल नौकरी तक पहुंचा जाय या किसी को पीछे या नीचा दिखाने के आश्य से ही प्राप्त की जाय। शिक्षा का आश्य हर उस काम को आसान बनाना हैं या यूं कहें हर उन अधिकारों के बारे में जानना या मनुष्य के विवेक को जागृत करके उसे निष्पक्ष सोच को बढ़ावा देने से ही हैं। शिक्षित बालिकाएं रूढिवादी सोच के बदलाव व पिछड़ेपन पर अपने विचार रखने के लिए कहीं न कहीं भूमिका में नज़र आ सकती हैं। यह तो कोई भी नहीं कह रहा कि अपनी संस्कृतिक पहचान को खोया जाय पर एक बात तो साफ हैं कि नियमित निर्धनता, माता पिता का पढ़ा लिखा न होना घरेलू कार्य पर अधिक ध्यान देना और समय से पहले शादी कर देना कहीं न कहीं मुस्लिम युवतियों की शिक्षा पर सवाल खड़े करते नज़र आते हैं।
घर के ही पास में रहने वाली बिना पिता की अकेली 14-15 साल की लड़की की मां से उसकी पास के ही स्कूल में नाम लिखवा देने पर वह कहती हैं कि अकेली लड़की को वह अब कहीं नहीं भेजना चाहती बाहर का माहोल ठीक नहीं हैं और घर के आर्थिक हालात ठीक नहीं हैं। अब इसकों घर पर ही हमने कुरानशरीफ़ पढ़ाना शुरू कर दिया हैं यही बहुत हैं, फिर इनकी शादी के बारे में भी सोचना हैं। अब सवाल केवल शिक्षा प्राप्ती का नहीं। अब सवाल यह हैं कि माह में एक लाख कमाने वाले परिवार बीस हज़ार बच्चों की शिक्षा पर खर्च करने वाले की तुलना इस परिवार से कैसे की जाय या शिक्षा न प्राप्त करने की जिम्मेदारी या बिटिया की सुरक्षा की जिम्मेदारी अब किसके कन्धें पर।
कहीं मुस्लिम लड़कियों को शिक्षा न दिला पाने पर माता व पिता पर प्रश्न चिन्ह लगा देना उन अविभावक के साथ न इंसाफी तो नहीं, जो अपना जीवन निर्धनता की श्रेणी में जीने को मज़बूर नज़र आते हैं। सवाल यह हैं कि गरीबी रेखा पर अपना जीवन यापन करने वाला एक परिवार पेट भर लेने की जद्दोजहद में शिक्षा की ओर कैसे आकर्षित होने वाला हैं या हमारा शिक्षा को लेकर अविभावक पर प्रश्न चिन्ह लगा देना कितना सहीं नज़र आता हैं। फिलहाल हमारे यहां तो शिक्षा भी बहुत महंगी हो चली हैं। महंगाई के इस दौर में पेट पूजा को भी नज़र अन्दाज़ करना असंभव सा नज़र आता हैं।
क्या हो सकती हैं समस्या: आर्थिक व राजनीतिक कार्य करने योग्य बनाने वाली शिक्षा कहीं न कहीं उस देश के सुधार में भागीदारी न दे पाने जैसा नज़र आता हैं, जिसको विश्व गुरू का ठप्पा दिया जा चुका हैं। भारत में किसी भी देश की तुलना में महिला साक्षरता दर या यूं कहें मुस्लिम महिला की साक्षरता बड़ी ही दयनीय नज़र आती हैं। हो सकता हैं हमारी सभी बाते सहीं न भी हो लेकिन अपनी चर्चां को आगे बढ़ाते हुए कि कई गरीब परिवार छोटे भाई बहनों की देखभाल या काम करने के लिए अपनी बेटियों को घर पर ही रखना कहीं न कहीं उस देश के साथ भी न इंसाफी ही करते नज़र आते हैं, जिसके योगदान के साथ देश को हर उस भागीदारी के करीब ले जाया जा सकता हैं। जिसके बिना मुकाम तक पहुंचना भी कठिन ही हैं। वैसे तो परिवार में पहले ही यह मान लिया जाता हैं कि बेटी की शिक्षा व्यर्थ यानी बेकार हैं। क्योंकि अंतत: वह शादी के बाद अपने पति के परिवार के साथ जायेगी। इसको अगर आसान भाषा में समझा जाये तो अगर किसी परिवार को अपने बेटे और बेटी के बीच शिक्षा को लेकर चयन करना हो तो बेटे को ही प्राथमिकता मिलने वाली हैं। क्योंकि माता पिता अक्सर बेटे में निवेश करने जैसा देखते हैं।
क्या धार्मिक ज्ञान पर ध्यान: यह बात किसी से छिपी नहीं हैं कि मुस्लिम समाज में धार्मिक ज्ञान को किसी भी अन्य सांसारिक ज्ञान से ऊपर ही रखा जाता रहा हैं। पर सांसारिक ज्ञान के साथ इसको दिया जाना ज्यादा उचित प्रतीत होता हैं। कहीं न कहीं पांच साल तक मदरसो में पढ़ाने के बाद लड़कियों को घर के काम काज व लड़को को बाहर के काम काज की ओर ध्यान दिलाने का प्रयास लगातार रहा हैं। धार्मिक गुरू समेत चाहें विचार किसी के भी कैसे रहें पर मुस्लिम समाज की लड़कियों के शिक्षा प्राप्ती पर विचार लड़कों से कम तो नहीं दिखायी देतें। पर करें तो करें क्या माता पिता के निर्णय को अपनी खुशी की सीमा जो मान बैठी हैं। ऐसे में वह हर लड़की खुद को कटघरे में ही पाती हैं जो बाकियों की तरह शिक्षा को लक्ष्य नहीं बना पाती फिर चाहें वज़ह जो भी हो उसे खत्म करने की जिम्मेदारी भी हमारी हीं नज़र आती हैं।
स्वतंत्र पत्रकारिता व कई अहम मुद्दों पर अपनी राय रखने वाली परसा तारिक़ कहती हैं कि अगर जमीनी तौर पर देखा जाय तो मुस्लिम समुदायों में लड़कियों की शिक्षा किसी स्पष्ट कारण से नहीं रूकती हैं, यह रोज़ के फैसलों से खत्म हो सकती हैं। जब पैसों की तंगी आ जाती हैं तो बेटे की शिक्षा को एक निवेश के रूप में देखा जाता हैं और बेटी की शिक्षा को रोका जा सकता हैं। दूरी व सुरक्षा इस बात के लिए अक्सर सीमित कर देती हैं कि वह कितनी दूर तक पढ़ सकती हैं और शादी अक्सर एक व्यवहारिक विकल्प के रूप में देखा जा सकता हैं।
समय के साथ लड़कियां भी किसी के रोकने से पहले अपने आपको सीमित करने लगती हैं, केवल धर्म ही लड़कियों को शिक्षा से नहीं रोकता बल्की समाज की उम्मीदे व इसका डर एक तरह से विकल्पो को सीमित करता हैं, जो कि अक्सर धर्म को औचित्य के रूप में उपयोग करते हैं।



