अस्थिर मिडिल ईस्‍ट…क्‍या ईरान में सत्‍तापरिवर्तन, अमेरिका क्‍यों कटघरे में?

सवाल हैं तो केवल यह कि अमेरिका व यूरोप के आमने सामने होने की स्थिति में विश्‍व के सबसे बड़े सैन्‍य संगठन नाटों के लिए समन्‍वय बनाना कितना कठिन होने वाला हैं। फिलहाल तो अभी तक किसी ने नाटो देश में सदस्‍यों के बीच युद्ध और उनके परिणान नहीं ही देखें होगें। चलिए आगे बढ़ते हैं कुछ और सवालों के साथ।

Ayatollah Ali Khamenei, Netanyahu and Donald Trump

इस ऑपरेशन की तैयारी कई महीनों से की जा रही थी। बड़ी बात यह रही कि अमेरिकी सेना धीरे-धीरे वेनेजुएला के तट के आसपास अपनी मौजूदगी बढ़ा रही थी, जबकि अमेरिकी खुफिया एजेंसियां राष्ट्रपति मादुरो की पर लगातार नजर बनाए हुए थीं। वेनेज़ुएला के राष्‍ट्रपति मादुरो कहां जाते हैं, किससे मिलते हैं और उनकी गतिविधियां क्या हैं, हर पहलू पर बारीकी से निगरानी की जा रही थी। जी हां Absolute Resolve नाम से शुरू हुए इस ऑपरेशन में अमेरिकी राष्‍ट्रपति ट्रंप के वक्‍तव्‍य कुछ चौकाने वाले ज़रूर रहें। किसी देश के राष्‍ट्रपति को इतने कम समय में गिरफ्तार कर अमेरिका में कैद कर लेना किसी फिल्‍मी स्क्रिप्‍ट से कम नहीं लगता पर यह कितना आसान हैं, इस पर सवाल ज़रूर परेशान करते नज़र आते हैं। चलिए आगे बढ़ते हैं और अब डिमांड ग्रीनलैंड की ओर जी हां विश्‍व में बादशाहत का ठप्‍पा पाने वाले संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका की डिमांड अब कुछ इसी तरह नज़र आती हैं। ईरान में जनता का सड़को पर विरोध प्रदर्शन और क्‍या अमेरिका की सैन्‍य कार्यवाही? विश्‍व राजनीति में वर्चस्‍व की लड़ायी और अन्‍य देशों की मौन्‍ता हर समय एक नये सवाल को जन्‍म देती नज़र आती हैं। फिलहाल कुछ इन्‍हीं मुद्दों के साथ आगें बढ़ने की कोशिश करेंगे। 

क्‍या यूरोप पर पड़ने वाला हैं असर? : सोना, निकल व कोबाल्ट, रेयर अर्थ मिनरल्स के तीन सबसे बड़े भंडार दक्षिण गार्दार प्रांत जैसे पारंपरिक संसाधनों के बड़े भंडार पर आश्रित ग्रीनलैंड पर नज़र गड़ाये अमेरिका, जिसकी विदेश नीति पर असर डालता यूरोप का डेनमार्क। ग्रीनलैन्‍ड पर अमेरिका का वक्‍तव्‍य क्‍या यूरोप की विदेश नीति पर एक बार फिर असर डालेगा। हालांकि ग्रीनलैंड पर अमेरिका की चाह कहीं न कहीं यूरोप को अपने से दूर ढकेलती नज़र आती हैं या यूरोप की मौन्‍ता एक बार फिर अमेरिका की वर्चस्‍वता को सलाम और दुनियां के लिए नये सवाल खड़े करते नज़र आती हैं या यह भी हो सकता हैं कि अमेरिका रेयर अर्थ मिनरल्स को लेकर चीन का दबदबा खत्म करना चाहता है। क्‍योंकि चीन ही इसके वैश्विक उत्पादन और आपूर्ति के बड़े हिस्से को नियंत्रित करता है। अगर ऐसा हैं तो अमेरिका के हर उस तरीके का विरोध लाज़मी नज़र आता हैं जो अन्‍तर्राष्‍ट्रीय कानून का उल्‍लंघन करता हैं। अब सवाल हैं तो केवल यह कि अमेरिका व यूरोप के आमने सामने होने की स्थिति में विश्‍व के सबसे बड़े सैन्‍य संगठन नाटों के लिए समन्‍वय बनाना कितना कठिन होने वाला हैं। फिलहाल तो अभी तक किसी ने नाटो देश में सदस्‍यों के बीच युद्ध और उनके परिणान नहीं ही देखें होगें। चलिए आगे बढ़ते हैं कुछ और सवालों के साथ। 

नाटो की एकता पर सवाल? : 32 देशों से मिलकर बनने वाला दुनियां के सबसे बड़े सैन्‍य संगठन नाटो में उस समय सुगबुगाहट तेज़ हो गयी जब अमेरिका ने ग्रीनलैंड की चाह रखी। नाटो में सबसे बड़ी सेना देने वाले अमेरिका को अपने सबसे घनिष्‍ठ मित्रों में से एक यूरोप की असहमति का सामना करना पड़ा और नाटो जैसे मज़बूत संगठन में सेंध जैसे लगने या खत्‍म होने की बात मीडिया के माध्‍यम से उठने लगी। अब सवाल साफ था क्‍या यूरोप की सहमति के बगैर अमेरिका की ग्रीनलैंड पर किसी भी तरह की कार्यवाही अमेरिका को गंभीर खामियाज़े की ओर ले जाती दिखायी देती हैं? दूसरा सवाल यूरोप की अमेरिका से दूरी कहीं रूस व चीन की तरफ जाने को मज़बूर तो नहीं?

क्‍या पंगू बना अन्‍तर्राष्‍ट्रीय कानून? : इंटरनेश्‍नल लॉ की किताब पढ़ते समय नज़र जाती हैं उस प्रावधान पर जिसमें लिखा हुआ था कि किसी देश के गृह युद्ध में मध्‍यक्षेप की भूमिका में केवल और केवल सुरक्षा परिषद का दायित्‍व या जिम्‍मेदारी अहम होती हैं। बहुत ढूंढने के बाद भी ऐसा कोई अन्‍तर्राट्रीय कानून नहीं नज़र आता जिसमें लिखा हो कोई देश किसी अन्‍य देश के राष्‍ट्रपति को अगवा कर 30 मिनट के अन्‍दर अपने देश में बन्‍दी बना सकता हैं या गृह युद्ध की कन्‍डीशंस में कोई अन्‍य देश हस्‍तक्षेप कर सकता हैं। हो सकता हैं कुछ प्रावधान को ढ़ूढने में मुझसे भूल हुयी हों पर यह बात तो साफ हैं, किसी भी देश की संप्रभुता व उस देश के नागरिक के मौलिक अधिकार कई मामलों में सर्वोच्‍च ही होते हैं।  

क्‍यों ईरान में अव्‍यवस्‍था? : मीडिया रिपोर्ट की माने तो कई दिनों से ईरान के लोग बढ़ती  महंगाई रियाल की गिरती कीमत व बिजली की बाधित होती सप्‍लाई से परेशान सड़क पर उतरने हेतु मज़बूर हैं। हालांकि ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि वेनेज़ुएला जैसे ही ईरानी तेल के कुंए पर अमेरिका की नज़र तो नहीं। फिलहाल एक बात तो साफ हैं। अमेरिका में रह कर ईरान नेशनल काउंसिल चलाने वाले रज़ा पहलवी को अमेरिका व इस्‍त्राइल का समर्थन इस बात को लेकर साफ करता नज़र आता हैं कि ईरान में सत्‍तापरिवर्तन पर यह ही अहम भूमिका में आने वाले हैं। फिलहाल तो ईरान से अज़रबैजान, अफगानिस्‍तान, पाकिस्‍तान, तुर्की से ज़मीन साझा करने वाले इन देश पर सवालिया निशान इस बात को लेकर जरूर दिखने वाले हैं कि ईरान पर अमेरिकी फौज को उतारने के लिए कौन देश अपनी ज़मीन देने वाले हैं। खुद को एक उदारवादी नेता के तौर पर पेश कर रहे रज़ा पहलवी कहते हैं कि वह ईरान को चुनाव, क़ानून का राज और महिलाओं के बराबर के हक़ की ओर ले जाना चाहते हैं। राजशाही वापस लाएं या गणराज्य बनाएं, यह फ़ैसला पूरे देश के वोट से होगा। वैसे तो रज़ा ने कई बार विरोधी गुटों को एकजुट करने के प्रयास भी किए, लेकिन वह असफल रहे। 2013 में नेशनल काउंसिल ऑफ़ ईरान बनाने वाले रज़ा अंदरूनी झगड़ों और ईरान के अंदर तक कम पहुंच होने के कारण वह नाकाम रहे। पर यहां सवाल यह हैं कि किसी देश को अस्थिर करने के पीछे क्‍या हैं मंशा? फिलहाल तो अमेरिका का ईरान को लेकर दिलचस्‍पी व रज़ा पहलवी का चर्चां में आना कोई आम संयोग नहीं लगता और हमे भी बहुत जल्‍द नतीजों पर पहुंचने पर उतसुक्‍ता नहीं दिखानी चाहिए।  

अन्‍तर्राष्‍ट्रीय मामलों पर करीब से नज़र रखने वाली पीएचडी रिसर्च स्‍कॉलर उरूसा क़मर कहती हैं कि मध्‍यपूर्व में ईरान पर अमेरिका की कार्यवाही एक गंभीर नतीजों की ओर ले जायेगी सब कुछ तबाह सा हो जायेगा। यहां सवाल केवल अमेरिका की कार्यवाही का नहीं सवाल यह हैं कि कार्यवाही के बाद की तबाही उस मानवता को गंभीर चुनौती देगी जो क्षेत्र पिछले कई सालों से युद्ध की आग में जल रहा हैं। यह न केवल गंभीर मानव के लिए चिंता के विषय के साथ मध्‍यपूर्व में भूखमरी जैसे चुनौती खड़ी करने वाली हैं। 

हमेशा की तरह हमारे पास सवाल अधिक हैं और जवाब पर मौनत: कायम हैं। फिलहाल एक बात तो ज़रूर समझ आती हैं, जो अमेरिका की वर्चस्‍वता को स्‍वीकार नहीं करेंगा उस देश को कुछ इसी तरह के नतीजे देखने पड़ सकते हैं फिर चाहें बात वेनेज़ुएला की हो या पाकिस्‍तान की हो या फिर बांग्‍लादेश की हो और ज़ब यह गाड़ी यूरोप तक पहुंचती हैं तो अमेरिका को गंभीर चुनौती की चेतावनी भी मिलती हैं। पाकिस्‍तान में इमरान खान की सरकार का सत्‍तापरिवर्तन, बांग्‍लादेश की शेख हसीना को भाग कर भारत में शरण लेना या हांलहि में वेनेजुएला के राष्‍ट्रपति को अगवा कर अमेरिका में ले जाना कहीं न कहीं एक बात तो साफ करता हैं कि अमेरिका की वर्चस्‍वता को स्‍वीकार नहीं करना किसी भी देश को एक तरह से गंभीर चुनौती की ओर ले जायेगा। फिलहाल पाकिस्‍तान व अफगानिस्‍तान में युद्ध जारी हैं, इंसानियत के खिलाफ होने वाले दुनियां के किसी भी कोने में युद्ध को दूर से देखने वाले देश केवल अपने हथियार का मोल भाव करने में जुटे दिखायी देते हैं।

लेख पर विचार विमर्श करते हुए जानकारी हुयी आखिर अमेरिका व ईरान के बीच संघर्ष शुरू हो चुका हैं। मीडिया रिपोर्ट से मिली जानकारी के अनुसार यह युद्ध मिडिल ईस्‍ट के कई देशों में अमेरिकी सैन्‍य अड्डो तक पहुंचने की पूरी उम्‍मीद जतायी जा रही हैं। ईरान की जवाबी कार्यवाही में अमेरिका के बहरीन, कतर, यूएई, दुबई, इराक, सऊदी अरब, जॉर्डन में स्थित सैन्‍य सिस्‍टम पर कार्यवाही की पूरी उम्‍मदी जतायी जा रही हैं। कुछ भी कहा जाय एक बार फिर मुस्लिम देशों को बड़ा खामियाज़ा भुगदना पड़ सकता हैं या फिर एक बार इंसानियत शर्मशार होने वाली हैं। देश फिर पचास साल पीछे होने वाले हैं। भुखमरी एक बार फिर बड़ा विकराल रूप लेगी और अन्‍तर्राष्‍ट्रीय संस्‍थायें एक बार फिर मूक दर्शक ही दिखायी देंगी।

MOHAMMAD TALIB KHAN

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