रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र लखनऊ परिसर में राष्ट्रवाद के शिखर पुरुष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पं. दीन दयाल उपाध्याय और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के राष्ट्र प्रेरणा स्थल का उदघाटन कर बिगुल फूँका। लोकसभा में सीटों का लंबा सफर तय करने वाली अटल-आडवाणी की जोड़ी से मोदी-शाह की जोड़ी तक पार्टी ने हर दशक में नई उपलब्धि हासिल करने में कहीं न कहीं हिंदुत्व का मुद्दा किसी से छिपा नज़र नहीं आता।
देश की संसद में भागीदारी से शुरू होती राजनीति की शुरुआत तो जनता के मुद्दे कहीं खोये तो कहीं पार्टियों के एजेंडा तक सीमित दिखाई पड़ते है। जनसंघ पार्टी के इतिहास से जुड़ी भारतीय जनता पार्टी एक विजय रथ पर सवार 2014 से देश की राजनीति का प्रतिनिधित्व करती दिखायी देती नज़र आती तो वहीं 2014 से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर लगातार काबिज़ रहने वाले नरेंद्र मोदी के प्रति जनता का उत्साह फिलहाल के लिए कम तो नहीं दिखायी देता हैं वहीं बिहार की राजनीति में अपना बिगुल पीटने वाली NDA अगले राज्य पर अपनी नज़र गड़ाए बैठी नज़र आती है। फिलहाल देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र लखनऊ परिसर में राष्ट्रवाद के शिखर पुरुष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पं. दीन दयाल उपाध्याय और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के राष्ट्र प्रेरणा स्थल का उदघाटन कर बिगुल फूँका। लोकसभा में सीटों का लंबा सफर तय करने वाली अटल-आडवाणी की जोड़ी से मोदी-शाह की जोड़ी तक पार्टी ने हर दशक में नई उपलब्धि हासिल करने में कहीं न कहीं हिंदुत्व का मुद्दा किसी से छिपा नज़र नहीं आता।
ज़मीन से उठ कर आज विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरने वाली BJP के नेतृत्व को लेकर खींचा तानी आज किसी से छिपी नजर नहीं आती खैर लोकतान्त्रिक देश में हर नागरिक से देश पर राजनीति की चर्चा एक नये सवाल पर और फिर चर्चा हो भी क्यों न, क्यों कि चर्चाओं से ही राजनीति की तस्वीर तक पहुंचना आसान नज़र आता है।
क्या हैं नागरिक के सवाल?: देश के ही एक नागरिक से बातचीत के दौरान 2029 के लोकसभा चुनाव पर BJP प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर पहुंचने पर उनके जवाब कुछ अलग दिखायी देते है, वह कहते हैं कि अगर 2029 में BJP-NDA गठबंधन के साथ पूर्ण बहुमत में आती है और प्रधानमंत्री मोदी कुर्सी पर नहीं बैठते है, तो कुर्सी पर कौन बैठेगा इस बात को लेकर कहीं न कहीं खींचा तानी देखने को मिलेगी। फिलहाल लोकतंत्र के सबसे ज़रूरी तत्व में से एक नगरिक और उसके सुझाव या उस नागरिक के मन के सवाल एक नई ऊर्जा और देश की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने में एक तत्व से दिखायी देते हैं। फिलहाल एक स्थिति तो साफ दिखायी देती है कि चाहें BJP या NDA शासित राज्यों के मुख्यमंत्री हो या देश के कई प्रभावशाली नेता अपने को किसी प्रधानमंत्री की दावेदारी में पीछे नहीं रखते और क्यों न भी रखें आखिर हर एक राजनीतिज्ञ का सपना उस देश के सर्वोच्च लोकतांत्रिक पद पर होता ही हैं।
वैसे तो प्रधानमंत्री मोदी के बाद NDA की ओर से देश का प्रतिनिधित्व करने में अमित शाह, नितिन गडकरी, योगी आदित्यनाथ आदि नाम लेने में किसी को कोई भी गुरहेज़ नहीं होना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारतीय जनता पार्टी में नेता तय करेगा विचारधारा या भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा पर चलने वाला कोई भी छोटे से छोटा नेता भी प्रधानमंत्री की दावेदारी पेश कर सकता हैं या यूं कहें कि हिन्दुत्व का एजेंडा लेकर चलने वाला भारतीय जनता पार्टी का नेता प्रधानमंत्री पद का दावेदार बन सकता हैं। फिलहाल के लिए ये सारी चर्चा हमारी व्यक्तिगत हो सकती हैं पर इन चर्चा से क्या कोई जवाब निकलने वाला हैं? लेकिन निष्कर्श पर निकलने की कोशिश जारी रहेगी।
क्या हो सकती RSS की भूमिका?: वैसे तो RSS किसी भी पार्टी में राजनीतिक हस्तक्षेप या किसी भी तरह की राजनीतिक भागीदारी को अस्वीकार करती रही हैं। पर क्या देश की राजनीति हो या राजनीतिक भागीदारी में भूमिका को इन्कार करना फिलहाल के लिए उस देश के साथ ही न इंसाफी ही नज़र आती हैं, जिस देश को विश्वगुरू की भूमिका निभाने में गुरहेज़ नहीं या बहुसंस्कृतिकवाद ने देश को नयी ऊर्जावान बनाया हो। वैसे तो देश की राजनीति में आरोप प्रत्यारोप के इस दौर में चर्चा का दौर जारी हैं और हम भी चर्चा ही कर सकते हैं, निष्कर्श पर तो देश की जनता ही पहुंचाती हैं।
फिलहाल के लिए अपनी चर्चा को आगे बढ़ाते हुए वेट और वॉच भूमिका के साथ आगे बढ़ने वाली संघ इस बात पर ज़रूर नज़र गड़ाये नज़र आती हैं कि किस नेता में हिन्दुत्व का एजेंडा लेकर चलने की क्षमता हैं या यूं कहें उसी पर आशीर्वाद संघ का भी नज़र आता हैं या यूं कहें हमारे कयास गलत भी हो सकते हैं। पर क्या करें एक लोकतांत्रिक देश में जनता के सवालों से शुरू होती चर्चा क्या किसी भी नतीजे में पहुंचती नज़र आती हैं? फिलहाल लोकतांत्रिक देश की सबसे खूबसूरत तस्वीर में से एक सवाल और सवाल और इस सवाल से शुरू होती एक नयी सुबह दिखायी देती हैं। फिलहाल बिहार चुनाव में विजयगाथा लिखने वाली बीजेपी अब पश्चिम बंगाल पर नज़र गड़ाये दिखायी देती हैं।
क्या कहते हैं जानकार?: राजनीतिक मामलों में समझ रखने वाले अपने मित्र से 2029 के लोकसभा चुनाव के विषय में पूछने पर वह एनडीए के एक बार फिर रिपीट होने की बात को स्वीकार करते हैं। साथ ही वह इस बात से बिलकुल भी गुरहेज़ नहीं करते कि बीजेपी की मुख्य विरोधी पार्टी चुनाव लड़ती दिखायी नहीं देती। अगर मान भी लेते हैं कि दूसरे राजनीतिक विचारक की राय इससे विपरीत भी हैं तो देखने वाली बात यह रहने वाली हैं कि तीन बार से जीत का बिगुल फूक चुकी बीजेपी समेत एनडीए के दल कितने ही कमज़ोर होगें कि कांग्रेस सत्ता में वापसी करेगी। फिलहाल के लिए तो ऐसे कोई भी हालात नज़र नहीं आते की 2029 के चुनाव में कांग्रेस विजय का बिगुल फूकने वाली हैं और अगर कांग्रेस के बहुमत तक पहुंचने कयास भी लगाये जाय तो तीन बार से पूर्ण बहुमत में आने वाली एनडीए को कितना ही कमज़ोर करने में सझम होने वाली हैं, यह भी देखने वाली बात होगी।
हिन्दुत्व की राजनीति : अब सवाल यह हैं कि विपक्ष की मुख्य भूमिका में दिखने वाली कांग्रेस कैसे देगी बीजेपी के हिन्दुत्व का जवाब क्या कांग्रेस बीजेपी के हिन्दुत्व के कार्ड का कोई मज़बूत जवाब निकालने वाली हैं? अगर ऐसा हैं तो क्या 2029 के लोकसभा चुनाव में कोई बदलाव की राजनीति दिखायी देगी? अब बात जो भी हो हर चुनाव में अपनी बहुमत का दावा करने वाली कांग्रेस अपने आपको किस तरह देखती हैं? कहीं उसके ही अस्तित्व पर खतरा तो नहीं? फिलहाल के लिए तो 2029 के चुनाव में भी कांग्रेस के किसी मज़बूत एजेंडे के साथ उतरने की तैयारी न सी ही दिखायी देती और अगर काग्रेस किसी एजेंडे की तैयारी में हैं भी तो उसके बीजेपी हिन्दुत्व के कार्ड पर क्या जवाब होने वाला हैं, इस पर गहन विचार की ज़रूरत नज़र आती हैं। फिलहाल तो बीजेपी का इतिहास रचने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जीत के रथ को रोकने के लिए कांग्रेस की क्या तैयारी होने वाली हैं इस पर कांग्रेस को गहन विचार की ज़रूरत हैं।



