जस्टिस सूर्य कांत ने मध्य प्रदेश राज्य बनाम महेंद्र उर्फ गोलू (2022) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि तैयारी का अर्थ है साधन जुटाना, जबकि प्रयास वहां से शुरू होता है जहां तैयारी खत्म होती है और आपराधिक मंशा का निष्पादन शुरू होता है.

SUPREME COURT : इलाहबाद हाई कोर्ट का एक और फैसला हुआ रद्द आपको बता दें सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को रद कर दिया है, जिसमें आरोपियों के खिलाफ ‘दुष्कर्म के प्रयास’ के आरोप को घटाकर कपड़े उतारने के इरादे से हमला कर दिया गया था.
वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने दिया तर्क : याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता और एच. एस. फूलका ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट का यह दृष्टिकोण कानूनन गलत और असंवेदनशील है. उन्होंने कहा कि इस तरह के फैसले यौन अपराधों के खिलाफ महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के प्रयासों को कमजोर करते हैं. उत्तर प्रदेश राज्य का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अतिरिक्त महाधिवक्ता शरण देव सिंह ठाकुर ने किया.
कृत्य केवल तैयारी या प्रयास : जस्टिस सूर्य कांत ने मध्य प्रदेश राज्य बनाम महेंद्र उर्फ गोलू (2022) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि तैयारी का अर्थ है साधन जुटाना, जबकि प्रयास वहां से शुरू होता है जहां तैयारी खत्म होती है और आपराधिक मंशा का निष्पादन शुरू होता है. कोर्ट ने तथ्यों पर गौर किया कि आरोपी नाबालिग पीड़िता को मोटरसाइकिल पर ले गए, उसे एक पुलिया के पास रोका, खींचा और उसके साथ यौन कृत्य (कपड़े उतारने की कोशिश) किया. यह कृत्य केवल इसलिए पूरा नहीं हो सका क्योंकि पीड़िता की चीख सुनकर गवाह वहां पहुंच गए. शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि पीड़िता को जबरदस्ती ले जाना और उसके कपड़े उतारने की कोशिश करना, केवल अपराध की ‘तैयारी’ नहीं बल्कि ‘दुष्कर्म का प्रयास’ है.
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के तर्क को खारिज करते हुए कहा आरोपों को देखने से इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि आरोपियों ने पूर्व-निर्धारित इरादे के साथ धारा 376 का अपराध करने की कोशिश की यह स्पष्ट है कि शिकायतकर्ता की कहानी के अनुसार, आपराधिक मंशा का निष्पादन शुरू हो चुका था. पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट का यह निष्कर्ष कि यह मामला केवल तैयारी का है, आपराधिक न्यायशास्त्र के सिद्धांतों का स्पष्ट रूप से गलत अनुप्रयोग है. अपीलों को स्वीकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के 17 मार्च, 2025 के फैसले को निरस्त कर दिया. साथ ही कोर्ट ने कासगंज के विशेष न्यायाधीश (POCSO) द्वारा जारी 23 जून, 2023 के मूल समन आदेश को बहाल कर दिया है. यानी अब ट्रायल आईपीसी की धारा 376 (धारा 511 के साथ पठित) और पॉक्सो एक्ट की धारा 18 के तहत चलेगा.
गठित हुई विशेषज्ञ समिति : जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है. मामले की पृष्ठभूमियह मामला एक स्वयंभू रिट याचिका से जुड़ा है, जो संगठन वी द वूमेन ऑफ इंडिया की संस्थापक और वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश को लिखे गए पत्र पर आधारित थी. पत्र में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 17 मार्च, 2025 के फैसले पर चिंता जताई गई थी. मूल मामले में, कासगंज के विशेष न्यायाधीश (POCSO) ने दो आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 (दुष्कर्म) और पॉक्सो एक्ट की धारा 18 के तहत समन जारी किया था.



