याचिका में चुनाव आयोग पर अपने संवैधानिक अधिकारों से आगे बढ़ने और मतदाताओं पर “अनुचित बोझ” डालने का आरोप लगाया. इसमें मुख्य रूप से क्या EC का यह कदम वास्तव में ऐसी विधायी गतिविधि है, जो केवल संसद और राज्य विधानमंडलों के लिए आरक्षित है.

SUPREME COURT : आज सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई हुई, जहाँ पर सरकार समेत वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंहवी और कपिल सिब्बल उपस्थित हुए.
जहाँ पर याचिका में चुनाव आयोग पर अपने संवैधानिक अधिकारों से आगे बढ़ने और मतदाताओं पर “अनुचित बोझ” डालने का आरोप लगाया. इसमें मुख्य रूप से क्या EC का यह कदम वास्तव में ऐसी विधायी गतिविधि है, जो केवल संसद और राज्य विधानमंडलों के लिए आरक्षित है.
बहस के दौरान सिंहवी ने कहा : वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंहवी ने कहा कि आयोग चुनाव कराने के नाम पर ऐसे कदम उठा रहा है, जो पूरी तरह विधायी प्रकृति के हैं. उन्होंने दलील देते हुए कहा संविधान का अनुच्छेद 324 को अनुच्छेद 327 के साथ पढ़ा जाना चाहिए, जो चुनाव संबंधी कानून बनाने का अधिकार संसद को देता है. चुनाव आयोग विधायी काम नहीं कर सकता. वह किसी भी मानक पर संविधान की व्यवस्थाओं के भीतर ‘तीसरा सदन’ नहीं है. केवल संविधानिक निकाय होना उसे असीमित और पूर्ण विधायी शक्ति नहीं देता. बहस के दौरान सिंहवी कहते हैं कि 11-12 दस्तावेजों की मांग की गई है. यह नियमों में कहां है? ऐसा फॉर्म केवल अधीनस्थ विधायन से ही आ सकता है.
क्या कहते हैं वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल : वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने भी SIR के दायरे पर सवाल उठाते हुए कहा कि बूथ लेवल ऑफिसरों (BLO) को ऐसे अधिकार देना संवैधानिक रूप से असंगत है. सिब्बल ने कहा क्या एक स्कूल टीचर, जो BLO है, तय करेगा कि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक है या मानसिक रूप से अस्वस्थ? यह खतरनाक और अविवेकपूर्ण है. सिब्बल कहते हैं. अगर मेरे पिता ने 2003 में वोट नहीं किया, या उससे पहले उनकी मृत्यु हो गई, तो मैं यह बोझ कैसे उठाऊंगा?
क्या कहती हैं कोर्ट : पीठ ने कहा कि यदि ऐसा माना जाए तो EC कभी यह प्रक्रिया कर ही नहीं सकेगा” और यह भी कहा कि SIR रोज़मर्रा का अपडेट नहीं है. बुधवार को हुई सुनवाई में पीठ ने कहा था कि यह दलील पर्याप्त नहीं है कि देश में पहले कभी SIR नहीं हुआ. कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग के पास Form 6 में दर्ज प्रविष्टियों की शुद्धता जांचने की अंतर्निहित शक्ति है. पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि आधार कार्ड नागरिकता का पूर्ण प्रमाण नहीं है, अब अगली सुनवाई 2 दिसंबर को होंगी.



