‘सेल्फ-सर्विस’ और ‘उपकरण किराए पर देने’ के तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया. हुक्का तैयार करने की प्रक्रिया जिसमें बेस में पानी भरना, चिलम में तंबाकू सजाना, फॉयल में छेद करना और सुलगते कोयले रखना शामिल है.

HIGH COURT HUKKAH BAR JUDGMENT : इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि रेस्तरां, होटल और कैफे के डेजिग्नेटेड स्मोकिंग एरिया (निर्धारित धूम्रपान क्षेत्र) में हुक्का बार चलाना या हुक्का सेवा प्रदान करना भारतीय कानून के तहत पूरी तरह से गैर-कानूनी है.
उत्तर प्रदेश भर के आतिथ्य प्रतिष्ठानों द्वारा दायर 80 रिट याचिकाओं को खारिज करते हुए कोर्ट ने माना कि ‘प्रोहिबिशन ऑफ स्मोकिंग इन पब्लिक प्लेसेज रूल्स, 2008’ में वर्ष 2017 में किए गए संशोधन ने स्मोकिंग जोन के भीतर किसी भी प्रकार की सेवा देने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है. कोर्ट ने कहा कि इस संशोधन के बाद वे पुराने न्यायिक फैसले निष्प्रभावी हो चुके हैं, जिनमें शर्तों के साथ हुक्का की अनुमति दी गई थी.
याचिकाकर्ता और राज्य सरकार की ज़ोरदार बहस : मामले पर 80 से ज्यादा कनेक्टेड पेटिशन पर कई अधिवक्ताओ ने ज़ोरदार बहस की. सरकार की तरफ से उपस्थित अधिवक्ता पंकज खरे व नगर निगम लखनऊ की तरफ से उपस्थित अधिवक्ता मोहम्मद तालिब खान व अन्य ने भी अपने सबमिशंस के साथ ज़ोरदार बहस की जिसके बाद याचिकाकर्ताओ की दलीलो को कोर्ट ने ख़ारिज किया और राज्य सरकार व नगर निगम लखनऊ के पक्ष में फैसला दिया.

सेल्फ-सर्विस’ की दलीलों को किया खारिज : कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के ‘सेल्फ-सर्विस’ और ‘उपकरण किराए पर देने’ के तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया. हुक्का तैयार करने की प्रक्रिया जिसमें बेस में पानी भरना, चिलम में तंबाकू सजाना, फॉयल में छेद करना और सुलगते कोयले रखना शामिल है-का विवरण देते हुए कोर्ट ने कहा इस फैसले के पैरा 32 में दर्ज हुक्का तैयार करने की पद्धति को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि याचिकाकर्ताओं की सेल्फ-सर्विस मॉडल की दलील संशोधित नियमों के नियम 4 (3) का मखौल उड़ाने जैसी है. हम इसे कतई स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि हम हाईकोर्ट के जज मुख्यभूमि में चल रही हुक्का बार, लाउंज और रेस्तरां की गतिविधियों से कटे हुए किसी निर्जन द्वीप पर नहीं रहते हैं. हुक्का के सेल्फ-सर्विस का यह पूरा तर्क न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि इस अदालत की बुद्धिमत्ता और व्यावहारिक ज्ञान को भी कमतर आंकने वाला है.
कोर्ट ने बिना ड्राइवर के टैक्सी किराए पर लेने के उदाहरण को भी नामंजूर कर दिया. कोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति कार किराए पर लेता है तो उसके पास उसका पूरा नियंत्रण होता है और वह उसे कहीं भी ले जा सकता है. लेकिन हुक्का के मामले में ग्राहक को उसे केवल रेस्तरां के डेजिग्नेटेड स्मोकिंग एरिया के भीतर ही इस्तेमाल करने की पाबंदी होती है. ग्राहक को कभी भी उसका पूर्ण आधिपत्य या नियंत्रण नहीं मिलता, इसलिए यह पूरी प्रक्रिया प्रतिफल लेकर दी जाने वाली एक व्यावसायिक सेवा ही है.
कोर्ट का अंतिम निर्णय : कोर्ट ने निर्णय दिया उपरोक्त सिद्धांतों के सूक्ष्म परीक्षण के उपरांत यह अदालत इस स्पष्ट निष्कर्ष पर पहुँचती है कि याचिकाओं द्वारा उठाया गया यह सवाल-कि क्या उत्तर प्रदेश राज्य में सार्वजनिक स्थलों के भीतर स्थित डेजिग्नेटेड स्मोकिंग एरिया में हुक्का बार कानूनी रूप से संचालित किए जा सकते हैं और हुक्का सेवा दी जा सकती है-नकारात्मक रूप से तय किया जाता है. सार्वजनिक स्थल पर किसी गैर-धूम्रपान करने वाले व्यक्ति का स्वच्छ हवा में सांस लेने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत एक मौलिक अधिकार है, जिसे अनुच्छेद 19 (1) (जी) के तहत किसी प्रतिष्ठान के व्यापारिक हितों द्वारा छीना नहीं जा सकता. तदनुसार, यह अदालत मानती है कि उत्तर प्रदेश राज्य में रेस्तरां द्वारा हुक्का बार का संचालन और हुक्का सेवा प्रदान करना वर्ष 2017 में संशोधित रूल्स, 2008 के नियम 4 (3) का खुला उल्लंघन है और यह कोटपा के उद्देश्य और योजना के प्रत्यक्ष विपरीत है. हाईकोर्ट ने सभी 80 रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया. साथ ही, रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि आदेश की प्रति तत्काल अनुपालन के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को भेजी जाए.
पूरा जजमेंट पढ़े रिट (सी) 10713/23



