हिजाब, बुर्का व नकाब जी हां भारतीय राजनीति की शुरूआत अब इन्हीं शब्दों से, कुछ इन्हीं मुद्दों पर सत्तापक्ष की राजनीति तो विपक्ष की दावेदारी सधती नज़र आती हैं और जब बात लोकतांत्रिक देश में चुनावी सहगर्मी की हो तो चर्चा का विषय नहीं ढूंढते, ढूंढतें हैं तो धार्मिक मुद्दें। चलिए वापस आते हैं, अब अपने चुनावी मुद्दे हिजाब, बुर्का व नकाब पर। वैसे तो इसे कोई राजनीतिक वेश, तो कोई धार्मिक वेश, तो कोई इसे सुरक्षा की दृष्टि से देखना पसंद करता हैं। एक ही पोशाक को देखने का नज़रिया कहीं न कहीं बदला-बदला सा दिखायी देता हैं। वैसे बताते चले हिजाब की शुरुआत पैगंबर मुहम्मद के समय लगभग 627 ईस्वी में हुई थी। इसे महिलाओं की सुरक्षा और उनके सम्मान के प्रतीक के रूप में अपनाया गया था। यानी इसका सीधा आश्य महिलाओं की सुरक्षा से था। उस समय भी एक महिला को अपनी सुरक्षा अपने तरीके से करने का पूरा अधिकार प्राप्त था और शायद आज भी हर महिला को अपनी सुरक्षा अपने तरीके से करने का पूरा अधिकार हैं। फिर चाहें वह किसी भी धर्म से ताल्लुक क्यों न रखती हो।
बहुत सी सांस्कृतिक प्रथाओं को अपनाने वाला यह देश हर किसी को अपनी सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रखने की पूरी इजाज़त देता हैं। जिसे आज हमारे संविधान ने भी अपना रखा हैं। आपको बता दे उस समय भी अरब समाज में महिलाओं को उत्पीड़न से बचाने व उच्च सामाजिक दर्जा दर्शाने के लिए पर्दा करने की प्रथा शुरू की गयी थी। जिसमें सुरक्षा सबसे अहम मानी जाती थी और आज यह एक तरह से उस सामाज की सांस्कृतिक यानी कल्चर की रूपरेखा ले चुका हैं। वैसे जिस तरह देश के हर नागरिक को अपनी सुरक्षा का अधिकार प्राप्त हैं। उसी तरह मुस्लिम समाज की महिलाओं को भी सुरक्षा का पूरा अधिकार मिला हुआ हैं। वह भी अपने तरीके से। वैसे तो कुरान की आयतों (जैसे सूरह 33:53) में महिलाओं के लिए शालीनता और खुद को ढँकने के निर्देश दिए गए हैं और आज के समय में महिलाएं कहीं न कहीं इसे अपनी धार्मिक पहचान, संस्कृति या व्यक्तिगत पसंद व सुरक्षा की दृष्टि से जोड़ते हुए दिखाती हैं। वैसे बात चाहें कुछ भी हो पर इन मुद्दों से राजनीतिक सहगर्मी ज़रूर बढ़ जाती हैं।
क्या यह सांस्कृतिक पहचान: भारतीय संविधान में हर किसी को अपनी सांस्कृतिक यानी अपने कल्चर की पहचान को बनाये रखने की इजाज़त दी गयी हैं। अगर सुरक्षा की दृष्टि से अपनाये गये पोशाक को एक सांस्कृतिक रूपरेखा दिया गया तो मेरे ख्याल से किसी को कोई गुरहेज नहीं होना चाहिए। चलिए थोड़ी देर के लिए मान भी लेते हैं कि सुरक्षा की दृष्टि से अपनाये गये पोशाक को सांस्कृतिक पहचान कैसे दिया गया तो उसी भारतीय संविधान में ही हर किसी को अपने तरीके से बिना किसी को नुकसान पहुंचाये अपने आपको सुरक्षित करने का अधिकार भी निहित हैं। अब चाहें मुद्दा सांस्कृतिक हो या सुरक्षा का दोनों ही अधिकार भारतीय संविधान में दिये गयें हैं। लेकिन जब बात हिजाब पर राजनीति की हो तो चर्चां की रूपरेखा अपनी दिशा ज़रूर बदल देती हैं।
चर्चा उस वक्त ज़ोर से हो उठी जब कर्नाटक सरकार ने 2022 में स्कूल व कॉलेजों में हिजाब व धार्मिक प्रतीको को पहनने पर रोक लगायी हालांकि कर्नाटक सरकार द्वारा अपना ही आदेश वापस ले लिया गया। पर सवाल यह था कि क्या इस तरह का कोई आदेश बनाया जा सकता था? जो किसी की भी धार्मिक पहचान पर रोक लगाये फिर चाहें वह हिजाब हो या पगड़ी। वजह चाहें जो भी रही हो पर भारतीय राजनीति अब धार्मिक पहचान तक तो पहुंच ही गयी हैं और हम केवल चर्चांओं के लिए बन गयें हैं।
नकाब, बुर्का, हिजाब में अंतर: केवल सिर और बाल को ढ़कने के उद्देश्य से अक्सर हिजाब का इस्तेमाल किया जाता हैं। वहीं नकाब चेहरे को पूरा ढ़कता है, पर इसमें आंखें खुली रहती हैं। अब आते हैं बुर्का पर जो शरीर व चेहरे समेत सब कुछ कवर कर लेता है। हालांकि इस्लाम के पवित्र ग्रंथ कुरान में महिलाओं को अपनी गरिमा, शालीनता और सुरक्षा बनाए रखने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर खुद को ढंकने का निर्देश दिया गया है और शायद इसी तरह हर नागरिक को अपने धार्मिक सिद्धांतों पर चलने का पूरा अधिकार हमारा संविधान देता हैं। आगे बढ़ने से पहले आपको बताते चलें इस चर्चां का आशय किसी की धार्मिक भावनाओं को ढेस पहुंचाना तो बिलकुल भी नहीं पर संविधान के सिद्धांतों को आप तक पहुंचाने की कोशिश जारी रहेगी।
कानूनी मामलों पर अध्ययन करने वाली मेहनाज़ खातून कहती हैं कि अगर हम सच में धर्म की आज़ादी और अपनी पसंद का समर्थन करते हैं, तो मुस्लिम महिलाओं को भी बुर्का या हिजाब पहनने का अधिकार होना चाहिए, अगर वे ऐसा चुनती हैं। जब कोई वेस्टर्न या शरीर दिखावे वाले कपड़े पहनना चाहता है, तो लोग अक्सर कहते हैं कि मेरा शरीर, मेरी पसंद। तो फिर मेरा शरीर, मेरी पसंद वाली बात उस महिला पर क्यों लागू नहीं होनी चाहिए जो खुद को ढ़कना चुनती है? पसंद का मतलब दोनों फैसलों का सम्मान करना होना चाहिए। बेशक अगर किसी को बुर्का या हिजाब पहनने के लिए मजबूर किया जा रहा है, तो यह गलत है। लेकिन किसी महिला को इसे पहनने से रोकना भी उतना ही गलत है, जब यह उसका अपना फैसला हो।
कुछ धार्मिक व संस्कृतिक पहचान: सामान्य तौर पर देखा जाये तो किसी भी धर्म की पहचान कहीं न कहीं उसके पहनावें से की जा सकती हैं, जो कि उसके सांस्कृतिक पहचान को भी कहीं न कहीं दर्शाता हैं। कुछ उदाहरण से समझने की कोशिश करेंगें। जहां सनातन धर्म (हिंदू) में धोती-कुर्ता, अंगरखा (राजस्थान/गुजरात) और लुंगी-शर्ट (दक्षिण भारत), साड़ी को पहचान के रूप में दर्शाया जाता हैं। तो वहीं इस्लाम धर्म में कुर्ता-पायजामा, सिर पर टोपी, सलवार-कमीज, दुपट्टा या हिजाब उनकी सांस्कृतिक पहचाना को दर्शाता हैं। वही अगर सिख धर्म की बात करें तो कुर्ता-पायजामा के साथ सिर पर पगड़ी, सलवार-कमीज और ईसाई धर्म में सूट-बूट, पादरी विशेष चोगे व बौद्ध धर्म में भिक्षु पीले, नारंगी या मैरून रंग के चीवर आदि कहीं न कहीं धार्मिक पहचान को दर्शातें हैं। ऐसा कहीं भी नहीं कहा जा रहा कि किसी धर्म के लिए कोई भी वस्त्र अनिवार्य हैं। यहां यह बताने का आश्य केवल इतना हैं कि हर धर्म में वस्त्र कहीं न कहीं सांस्कृतिक पहचान बनते ही हैं। अगर सार्वजनिक स्थान पर अपनी सांस्कृतिक पहचान को नहीं बनाया जायेगा तो संविधान का उद्देश्य कहीं न कहीं अधूरा सा ही रह जायेगा। हो सकता हैं हमारी सारी बात गलत हो फिर भी एक और उदाहरण से समझते हैं। कोई शादीशुदा लड़की पढ़ना चाहती हैं और वह अपने कॉलेज में अपनी संस्कृति यानी साड़ी व सिंदूर के साथ जाती हैं। तो उसे केवल इस आधार पर पढ़ायी से नहीं रोका जा सकता कि उसे सार्वजनिक स्थान पर धार्मिक स्वतंत्रता दिखाने का अधिकार नहीं या उसने कॉलेज के नियमों का उल्लंघन किया हैं। सवाल यह हैं कि क्या वह शादीशुदा महिला उस कॉलेज में धार्मिक स्वतंत्रता दिखाने गयी थी? जवाब बिल्कुल भी नहीं। वह केवल संविधान से मिले अधिकार पर अपनी शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से उस कॉलेज में गयी थी। इसलिए कहा जा सकता हैं कि हर जगह सार्वजनिक स्थान की परिभाषा भी एक सी नहीं हो सकती हैं।
अब थोड़ा संविधान की तरफ: आर्टिकल-29(1) कहता है किसी भी वर्ग वह चाहे बहुसंख्यक हो या अल्पसंख्यक को अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति को सुरक्षित रखने का पूरा अधिकार है। आर्टिकल- 25 हर नागरिक को किसी भी धर्म को मानने, उसका अभ्यास करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, वह भी बिना किसी को नुकसान पहुंचाये। आर्टिकल-21 गरिमापूर्ण जीवन जीने की बात करता है। बात चाहें जो भी हो पर किसी को भी उसकी शिक्षा प्राप्त करने व गरिमापूर्ण जीवन जीने से नहीं रोका जा सकता। बाकी जनता ही सर्वोच्च हैं वह ही फैसला करें क्या सही व क्या गलत हैं।



