जुल्फिकार पठान ने कहा, हाई कोर्ट का फैसला पूरी तरह से पढ़ा नहीं है. इसमें जो त्रुटियां हैं, उसको लेकर हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे. हाई कोर्ट के फैसले का सम्मान है. बाकी जो फैसला आया है, हम उससे नाखुश हैं. हमारे वकील अभी समीक्षा कर रहे हैं. ASI की तरफ से भी बहुत सारी त्रुटियां हैं.

MADHYA PRADESH : इंदौर हाई कोर्ट बड़ा फैसला सुनाया आपको बता दें ने धार स्थित भोजशाला मंदिर और कमाल मौला मस्जिद विवाद काफी समय से पेंडिंग चल रहा था.
अदालत ने दिया पूजा का आदेश : शुक्रवार (15 मई) को इंदौर हाई कोर्ट ने विवादित स्थल को मंदिर मानते हुए हिंदुओं को पूजा का अधिकार दिया है. जिसको लेकर कमाल मौला मस्जिद नमाज इंतजामिया कमेटी के अध्यक्ष जुल्फिकार पठान ने प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने इस फैसले से नाखुशी जताई है. साथ ही कहा है हम इसकी समीक्षा कर रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट में जाएंगे. मामले पर जुल्फिकार पठान ने कहा, हाई कोर्ट का फैसला पूरी तरह से पढ़ा नहीं है. इसमें जो त्रुटियां हैं, उसको लेकर हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे. हाई कोर्ट के फैसले का सम्मान है. बाकी जो फैसला आया है, हम उससे नाखुश हैं. हमारे वकील अभी समीक्षा कर रहे हैं. ASI की तरफ से भी बहुत सारी त्रुटियां हैं. आगे वह कहते हैं, शांति व्यवस्था बनाए रखें. अभी आगे का अपना रास्ता खुला हुआ है. मुस्लिम समाज पूरे दमदार तरीके से कानूनी लड़ाई को सुप्रीम कोर्ट में लड़ेगा. मुस्लिम समाज जहां 800 साल से नमाज पढ़ रहा है, वहां से आज भी हम नमाज पढ़कर निकले हैं, उसके बाद हाई कोर्ट का आदेश आया और इस जगह को पूजा स्थल बताया गया है.
क्या कहा गया मुस्लिम पक्ष की ओर से : मुस्लिम पक्ष की ओर से अदालत में यह भी कहा गया कि परिसर लंबे समय से कमाल मौला मस्जिद के रूप में उपयोग में रहा है और धार्मिक स्वरूप तय करने का अधिकार सिविल कोर्ट को है.वहीं हिंदू पक्ष ने शिलालेखों, स्थापत्य अवशेषों, ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और वसंत पंचमी पर पूजा की परंपरा का हवाला देते हुए इसे मंदिर बताया.मामले में जैन पक्ष भी अदालत पहुंचा था. जैन समुदाय से जुड़े याचिकाकर्ताओं ने अदालत में कहा कि परिसर की स्थापत्य शैली राजस्थान के दिलवाड़ा जैन मंदिरों से मिलती है.
क्या हैं विवाद : धार स्थित भोजशाला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के संरक्षण में एक ऐतिहासिक परिसर है. हिंदू पक्ष इसे मां सरस्वती या वाग्देवी का मंदिर और प्राचीन शिक्षा केंद्र बताता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद कहता है. वर्तमान व्यवस्था के तहत साल 2003 से हिंदू समुदाय को मंगलवार को पूजा की अनुमति दी जाती है, जबकि मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार को नमाज़ की इजाज़त है. बाकी दिनों में परिसर पर्यटकों के लिए खुला रहता है. यह विवाद अदालत में नए चरण में 2022 में पहुंचा, जब हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस और अन्य याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की. इस याचिका में भोजशाला के धार्मिक स्वरूप का निर्धारण करने, हिंदू समाज को नियमित पूजा का अधिकार देने और परिसर में नमाज़ पर रोक लगाने की मांग की गई. इसके बाद हाईकोर्ट ने परिसर के वैज्ञानिक सर्वेक्षण का आदेश दिया था. 2024 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने परिसर का 98 दिनों तक सर्वे किया. इस सर्वे को मुस्लिम पक्ष से जुड़ी संस्था मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने सर्वे पर रोक नहीं लगाई, लेकिन रिपोर्ट को सीलबंद न रखने, पक्षकारों को प्रतियां देने और आपत्तियों पर अंतिम सुनवाई में विचार करने को कहा था. सुनवाई के दौरान अदालत में 1935 की उस प्रशासनिक व्यवस्था पर भी बहस हुई, जिसके तहत तत्कालीन धार रियासत ने मुस्लिम समुदाय को परिसर में नमाज़ की अनुमति दी थी.



