मानवाधिकार का विस्‍तार

क्या हैं मानवाधिकार? क्या इसे किसी सीमा में बांधा जा सकता हैं? क्या इसे किसी परिभाषा से सीमित किया जा सकता हैं? क्या इसका कोई दायरा भी हैं? इस तरह के तमाम सवाल समझने की कोशिश करेगें। फिलहाल भारत के संविधान में भी इन अधिकारों का उल्लेख देखने को मिलता है, पर सवाल यह हैं कि क्‍या भारत के बाहर जाने पर भी यह अधिकार बने रहते है? वैसे तो किसी भी लोकतान्त्रिक देश में इन अधिकारों का उल्लेख देखने को मिलता है। तो राजशाही या राजतंत्र प्रणाली में यह अधिकार कैसे मिलते हैं? चलिए आगे बढते हैं और समझने की कोशिश करेगें इन्‍हीं मुद्दों को।

ज़ब हुआ था मानवजाति का जन्‍म : ज़ब मानव जाति ने संसार में जन्म लिया, उसी समय प्राकृतिक ने उसे रहने खाने पीने की इज़ाज़त दी। वह किसी भी जगह पर रह सकता, घूम सकता, खा सकता था। आज उन्ही चीज़ो को करने के लिए कानून का सहारा लिया जाने लगा पर कानून का एक बेसिक स्ट्रक्चर उन अधिकारों का उपयोग बिना किसी को नुकसान पहुचाये जाने पर आधारित था यानी उन्‍हीं अधिकारों को कानूनी अधिकार में बांध दिया गया जिसको प्राकृतिक ने जन्‍मत: मनुष्‍य को दिया था। 

क्या यह अधिकार देश के बाहर भी लागू है: सवाल इस बात का भी हमारे सामने बना हुआ हैं कि क्या यह अधिकार भारत के बाहर भी मिलते हैं? इसको इस तरह समझा जा सकता हैं कि ज़ब रहने खाने पीने की आजादी हर देश में हैं तो यह अधिकार भी कभी नहीं ख़त्म होते और इन्हीं अधिकारों को देने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों की स्थापना का प्रथम दस्तावेज संयुक्त राष्ट्र चार्टर को माना जाता है। लेकिन मूल अधिकारों के रूप में इसका श्रेय 1215 के मेग्नाकार्टा को जाता है, यानी इन अधिकारों को भी कानूनी रूप से देने का प्रावधान किया गया। 

 सन् 1945 में जब संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई तब उसका एक चार्टर तैयार किया गया था। इस चार्टर के आर्टिकल- 68 में मानवाधिकारों के संरक्षण के लिये प्रारूप तैयार करने हेतु सन् 1946 में एलोनोर रूजवेल्ट की अध्यक्षता में एक मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया। आयोग ने जून 1948 में मानवाधिकार को एक विश्वव्यापी घोषणा का प्रारूप तैयार किया जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा 10 दिसम्बर को अंगीकृत किया। इन अधिकारों के माध्यम से ही हर देश में मानवाधिकार को सुरक्षा दी गयी है, यानी दुनियां का कोई भी नागरिक किसी भी देश में रहें उन्‍हें उनके प्राथमिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।

समझे भारतीय संविधान को : भारतीय संविधान के भाग-3 में आर्टिकल- 12 से 35 तक सबसे महत्‍वपूर्ण माने जाते है, क्‍योकि यह मूल अधिकारो को बताता हैं और यह मौलिक अधिकार भारतीय संविधान में संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका के संविधान से लिये गये है, समझने वाली बात यह है कि इन अधिकारो में स्‍वतन्‍त्रता का अधिकार सबसे महत्‍वपूर्ण माना जाता है। क्‍योकि यह अधिकार किसी भी देश को लोकतान्त्रिक देश बनाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। राज्‍य को भारत की प्रभुता, अखण्‍डता की सुरक्षा, लोक व्‍यवस्‍था, शिष्‍टाचार आदि के हितों की रक्षा के लिए निर्बन्‍धन लगाने की शक्ति प्रदान की गयी है। अब प्रश्‍न यह उठता है कि निर्बन्‍धन क्‍या है? यहां पर भी इस बात का निर्णय प्रत्येक मामले के तथ्‍यो और परिस्थितियों के आधार पर ही किया जा सकता है। इसीलिए कहा जा सकता हैं कि किसी भी देश का कोई भी नागरिक दुनिया के किसी भी कोने में रहे पर उसके रहने खाने या घूमने पर किसी भी तरह की रोक नहीं लगाई जा सकती क्यूंकि यह अधिकार कोई देश दे या न दें कोई कानून दें न दें पर प्रकृतिक ने हमारे जन्म के साथ ही इन अधिकारों को हमारे साथ बांध रखा हैं। बस इस स्वतंत्रता से किसी और के अधिकार का नुकसान न हो। इसीलिए कहा जा सकता हैं कि मानव अधिकार को किसी भी परिभाषा के साथ नहीं बांधा जा सकता। 

किसी भी देश के संविधान में किसी प्रावधान से, मौलिक अधिकारों को कहीं ऊपर माना जाता हैं। भारतीय संविधान में भी मौलिक अधिकार को सर्वोच्च माना जाता हैं पर सवाल यह हैं कि ज़ब प्राकृतिक रूप से जन्मत: अधिकार मिले हुए हैं तो इन्हे कानून में बाँधने की ज़रुरत क्यों?

क्यों कानूनी दायरे में अधिकार : ज़ब किसी को भी अधिकार मिलते हैं तो वह उन अधिकार का उपयोग कब सीमा से बाहर आ कर करने लगे इस पर रोक के लिए एक दायरा बनाया जाता हैं। चलिए समझें एक उदाहरण से एक आदमी को जीवन जीने का अधिकार हैं बिना किसी और के जीवन जीने के अधिकार पर रोक लगाए। ज़ब कोई भी व्यक्ति अपने अधिकारों को लेकर जागरूक दूसरे के अधिकारों पर बिना रोक लगाए इसका इस्तेमाल कर सकता हैं तो सवाल यह भी हैं क्या हर किसी को उनके अधिकार मिल जाते हैं? क्या हर व्यक्ति शिक्षा पाने में कामयाब होता हैं? या हर व्यक्ति अपने रोज़गार को पाने में कामयाब हो जाता हैं या हर व्यक्ति अपने अधिकारों को जान पता हैं? क्या कोई भी व्यक्ति अपने अधिकारों से वंचित नहीं होता? अगर ऐसा हैं तो इन अधिकारों का क्या फ़ायदा जो आख़री व्यक्ति तक न पहुंचे। सरकारों के साथ हर नागरिक का प्रथम कर्तव्‍य होना चाहिए कि अपने आसपास मौजूद हर शख्‍स को उनके अधिकार के बारे में जागरूक करें। 

MOHAMMAD TALIB KHAN

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